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Friday, July 11, 2014

                   बज़ट 2014 : कांग्रेसमुक्त मोदी सरकार का घोर 'कांग्रेसी' बजट ! (continued)

इसे ट्रेजडी कहें या प्रहसन, लेकिन सच्चाई यही है कि कांग्रेसमुक्त मोदी सरकार आर्थिक नीतियों के मामले में कॉंग्रेस के पद चिन्हों पर ही चल रही है. आम ग़रीब और मेहनतकश जनता, जिसने भी बड़े अरमानों से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में अपना योगदान दिया था/है, उनके लिए तो यह ट्रेजडी से कम नहीं ही है. और स्वयं नरेंद्र मोदी और पूरे मोदी ब्रिगेड, जिन्होनें आम जनों को कांग्रेसमुक्त भारत बनाने का सुनहरे स्वप्न दिखाए थे, के लिए यह निश्चय ही एक घटिए किस्म का प्रहसन हैं जिनके पात्रों को यह साबित करना (दोनों पक्षों - आम जनता और पूंजीपतियों व बाज़ार के ख़ूँख़ार गिरोहों दोनों - के समक्ष) मुश्किल हो रहा है कि यह बज़ट किस तरह से कांग्रेसमुक्त है और यह किस तरह पुराने डराबने सपनों में आने वालीे प्रेतछायायों से मुक्त हैं. 2014 का बजट पहले की ही तरह घोर रूप से पूंजीपक्षीय नीतियों का पुलिन्दा भर हैं। नवउदारवाद का वही पुराना मंत्रोचार इस बज़ट में भी किया गया है.अगर कहीं फ़र्क दिखता है, तो वह फ़र्क यही कि इस बज़ट में मोदी सरकार ने नवउदारवादी कदमों को सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं के ज़रिए मानवीय चेहरा भी प्रदान करने की भी ऐसी कोई खास कोशिश नहीं की है. उल्टे, सामाजिक और कल्याणकारी मदों में या तो कटौती की गयी है या बहुत कम वृद्धि की गयी है या फिर उन्हें जस का तस छोड़ दिया गया है जिसका अर्थ रियल टर्म (मौज़ूदा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की दृष्टि से) में कटौती ही होगा. आइए, थोड़ा विस्तार से चर्चा करें.......
नवउदारवाद को किन चीज़ों के लिए जाना जाता है? यह किन बातों अथवा चीज़ों का पर्याय और परिचायक है? सर्वप्रथम इसे हम निम्नलिखित बिंदुओं के तहत श्रेणीबद्ध कर सकते हैं...

1. सरकारी खर्च में कटौती और वित्तीय घाटा पर पूर्ण बंदिश
2. आम जनता को राहत पहुँचाने वाले तमाम कार्यक्रमों पर क्रमशः रोक
3. कृषि, उद्योग और सेवा सभी क्षेत्रों में से सरकार द्वारा अपने हाथ खींच लेना
4. श्रम मानकों को सख़्त और पूंजी मानकों को लचीला बनाना
5. श्रम क़ानूनों को क्रमशः लचीले होते पूंजी के मानकों व हितों के अनुरूप ढालते चले जाना
5. संगठित और औपचारिक क्षेत्र को क्रमशः छोटा बनाते हुए उसे पूंजी के साथ जोड़े व मिलाए रखना
6. असंगठित व अनौपचारिक क्षेत्र के दायरे को बढ़ाते हुए उसका अमानवीय शोषण की खुली छूट
7. पूंजी और ख़ासकर बाज़ार को अपने अंधे और अतर्किक नियमों को खुली छूट
8. कल्याणकारी कार्यक्रमों और सरकार की सामाजिक ज़िम्मेदारियों से क्रमशः पूर्ण वापसी...
9. और इससे निर्मित ग़रीबों व कंगालो की फ़ौज़ को पूंजी की सेवा हेतु जीवित रखने की ज़िम्मेवारी से भी मुँह मोड़ लेने की प्रवृति  

मोटा-मोटी ये हैं नव उदारवाद के मूलमंत्र और मोदी सरकार अक्षरशः इन्हीं कदमों पर चल रही है.

हम देख सकते हैं कि सरकारी खर्च में अधिकाधिक कटौती और पूंजी के हितों के पूर्ण प्रश्रय और संरक्षण के आधार पर जी.डी.पी.वृद्धि की कोशिश एक ही अर्थ हो सकता है - पूंजी के संकेंद्रण और केंद्रीकरण को खुली और बेलगाम छूट. यह स्वाभाविक रूप से ग़रीबों के उतरोत्तर अधिकाधिक दरिद्रीकरण, पूंजी के छोटे स्वामियों व प्रत्यक्ष उत्पादकों के संपत्तिहरण व स्वत्वहरण को और तेज करेगा और इस तरह इन सबके परिणामस्वरूप स्वयं पूंजी के परिचालन के क्षेत्र को उतरोत्तर कम करेगा. यह उलट कर अपनी बारी में और भी गहरे व तीखे आर्थिक संकटों को जन्म देगा...इसीलिए नवउदारवाद से अर्थव्यवस्था का संकट दूर होगा ऐसा सोचने वाले और कोई नहीं पूंजी के जरखरीद कलमघिस्सू गुलाम ही होंगे और कोई नहीं.

बजट में उल्लिखित प्रस्तावों की चर्चा करें तो निम्नलिखित बिंदु उभरते हैं..

1. प्रत्यक्ष टैक्स में बेसिक लिमिट/स्लॅब में तथा पी.पी.एफ.में 50000/ की छूट तथा होम लोन की ब्याज दर में थोड़ी छूट  :- ये सभी छूटें कहीं से भी 60-70 फीसदी ग़रीब व बेरोज़गार तथा मेहनतकश आबादी के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। यह मूलतः पूंजीपतियों और निम्न पूंजीपतियों (मध्य वर्ग) की ही भिन्न-भिन्न श्रेणियों के काम आएगी. हाँ, संगठित क्षेत्र के अपेक्षाकृत उच्च वेतनभोगी मज़दूर और राज्य व केन्द्र के  कर्मचारी भी इनसे लाभान्वित होंगे और जिससे मज़दूरों का यह तबका सरकार का समर्थक बन सकता है। इससे सुविधापरस्त और आर्थिक रूप से पूरी तरह विपन्न मज़दूरों के बीच खाई पैदा करने मे सरकर को ओर सुविधा होगी। संगठित और असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के बीच की खाई और चौड़ी होगी।  

2. सिर्फ यही नहीं, अमीरों यानि अमीर करदाताओं के लिए रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) बनाये जाएंगे जिनमें वे बचतपूर्वक निवेष कर सकते हैं। इसी तरह से,  उनके लिए ही रिटायरमेंट फ़ण्ड भी बनाएं के प्रस्ताव हैँ. "इकोनॉमिक टाइम्स" लिखता हैं - " .... however, the redeeming factor is that the budget paves the way for launch of real-estate investment trusts (REITs) that rich taxpayers could invest in. Also, the launch of retirement funds could help them save for retirement in a more transparent and cost-effective manner."

3. समाज का जो बहुत बड़ा मेहनतकश और गऱीब तबका महंगाइ की मार से सबसे असुरक्षित है, उसके लिए इस बजट में कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि न्यूनतम मज़दूरी के बारे में एक शब्द तक नहीं है।  

4. पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स पर से सब्सिडी में  22000 करोड़ रुपये की कटौती की गयी है, जिसका बोझ भी आम ग़रीब जनता पर ही पड़ेगा.

5. खाद्य सुरक्षा क़ानून और मनरेगा के तहत आबंटन को बनाए रखा गया है, लेकिन मोदी सरकार की और बड़े निर्लज़्ज़ पूंजीवादी गिरोहों की इसके प्रति नाखुशी जगजाहिर है. इसी वज़ह से इन दोनों मदों में आबंटन को पहले के स्तर पर ही बनाए रखा गया है, जिसका अर्थ है रियाल टर्म में आबंटन में कमी की गयी है .    

Wednesday, July 9, 2014

  • पूंजीवादी विपक्षी पार्टियाँ रेलवे बज़ट को दिशाहीन बता रही हैं. यह.सच नहीं है. ऐसा कहने के पीछे उनकी मंशा भी स्पष्ट है. वे देश में चल रही घोर रूप से पूंजीपक्षीय नीतियों पर चर्चा न हो यह चाहते हैं. सच्चाई यही है कि रेलवे बजट की दिशा सुस्पष्ट है. और वह दिशा है देश में पहले से ही जारी वह दिशा जिसे हम कुख्यात नवउदारवाद की दिशा के नाम से जानते हैं. मोदी सरकार के ( प्रथम) रेलवे बज़ट 2014 में देश में जारी वही पुराने 'कांग्रेसी' पूंजीपक्षीय आर्थिक सुधारॉं की निरंतरता का सहज़ बोध होता है. कोई भी बज़ट को देखकर यह समझ सकता है. निजीकरण और विनेवेशीकरण का वहीं घोर पूंजीपक्षीय ज़ोर, वही एफ.डी.आई., रेलवे जैसी देश की बहुमूल्य संपदा को बेचने की पहले ही जैसी तैयारी और इसके लिए वही पुराने घिसे-पिटे तर्क, कम आय वाले यात्रियों की सुविधाओं के प्रति वही दुराव व उपेक्षा की पुरानी भावना, आम यात्रियों व रेलवे की सुरक्षा के प्रति वही लापरवाही भरा नज़रिया और लचर नीति ..जी हाँ, सब कुछ पहले जैसा ही है. बल्कि, यह कहना चाहिए कि उसी पुरानी दिशा में जाने की रफ़्तार और तेज हो गयी है. पहले से ही छोटे-छोटे हिस्सों में बेची जा रही रेलवे को जल्द ही पूरी तरह से और तेज़ी से बेचने की नीतियों की स्पष्ट झलक इस रेलवे बज़ट में देखी जा सकती है. तब रेल भाड़ा का क्या होगा इसकी बस कल्पना की जा सकती है. और इसके तर्क ? वही 'कांग्रेसी' अर्थात खांटी रूप से पूंजीपक्षीय- नवउदारवादी तर्क हैं  जिन्हें कल तक कांग्रेस देती थी लेकिन आज़ मोदी सरकार द्वारा आज़ दिए जा रहे है, याने, कहा जा रहा है कि आख़िर रेलवे के विकास के लिए पैसा कहाँ से आएगा? हम जानते हैं कि रेल भाड़ा में वृद्धि के लिए भी यही तर्क दिया गया था. कोई इनसे पूछे तो सही कि बुलेट ट्रेन में अरबों रुपये किसके लिए और किसकी इज़ाज़त से फूँके जा रहे हैं? आख़िर इसकी माँग किस जनता ने की थी? रेलवे मंत्रालय के भारी भरकम खर्च को आम जनता क्यों ढोती रहे? पर सवाल है, जनता के अंदर इन सुलगते-जलते प्रश्नों का जवाब देने की किसे पड़ी है ? कौन है जो आम जनता की बात भी सुनने के लिए भी तैयार है? मार्क्स ने कहा है न - " अगर मज़दूर वर्ग क्रांतिकारी नहीं हैं, तो कुछ भी नहीं है." इसी को हम इस तरह कह सकते हैं कि - "आम जन साधारण लोग क्रांतिकारी नहीं हैं, तो वे कुछ भी नहीं हैं." और उनकी सुनने वाला भी कोई नहीं होगा.यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे अब किसी प्रमाण की कोई ज़रूरत नहीं है.    
    Posted 4 minutes ago by Shekhar Sinha

Monday, July 7, 2014

       "गरम रोला मज़दूर आंदोलन" और हमारा रवैया


"गरम रोला मज़दूर आंदोलन" भारत के मज़दूर वर्ग के आंदोलन का एक हिस्सा है. हम मानते हैं कि इसके समर्थन में खड़ा होना तमाम मज़दूर वर्गीय ताकतों का फौरी कर्तव्य है. इसके नेतृत्व में आज़ कौन, वह किस तरह का व्यवहार कर रहा है, या वह किसी और को इस आंदोलन में शामिल कर रहा है या नहीं, वह संयुक्त आंदोलन के प्रति ज़िम्मेवार और गंभीर है या नहीं ...इन मुद्दों को मज़दूर आंदोलन के समर्थन में खड़ा होनेे में बाधा बना लेने का मतलब है कि एक तरह की गुटीय करवाई के विरुद्ध एक और दूसरे तरह की गुटीय कार्रवाई में उतर जाना और मज़दूर आंदोलन के दूरगामी हितों की अनदेखी कर देना. अगर किसी संगठन की कमियों को उजागर भी करना है, उनका पर्दाफाश करना है और/या उन्हें दुरुस्त करना है, तो इसके लिए भी ज़रूरी है कि इसमें समस्त मज़दूर आंदोलन के दूरगामी हितों और उसके उच्चतर लक्ष्यों को सामने लाते हुए गैर-गुटीय तौर पर अंदर और बाहर दोनो तरफ से, जैसा मौका हो, हस्तक्षेप करना चाहिए.......आख़िर एक वाज़िब मज़दूर आंदोलन के समर्थन से हम अपना मुँह कैसे मोड़ सकते हैं? गरम रोला के वर्तमान नेतृत्व ने अगर दिल्ली में इस आंदोलन में और दूसरे संगठनों को शामिल नहीं किया, तो भी आंदोलन के समर्थन में खड़ा होने की ज़रूरत है, यह सोचना कि चलो आंदोलन मार खा जाए तो अच्छा है, तभी इन्हें पता चलेगा और हेंकड़ी निकलेगी, तो हमें यह प्रतीत होता है कि यह भी एक तरह की गुटीय सोच का परिचायक ही है. इसे अंततः एक गुटीय कार्रवाई के खिलाफ एक गुटीय प्रतिक्रिया ही कहा जाएगा. इससे आंदोलन को अंततः कोई फ़ायदा नहीं होता है और न ही हम आंदोलन में मौज़ूद ग़लत प्रवृतियों का ही पर्दाफाश कर पाते है, उल्टे, मज़दूरों व मज़दूर आंदोलन के अंदर व्याप्त गुटीय मानसिकता को ही हम और मज़बूती प्रदान किए देते हैं
हम सभी मज़दूर वर्गीय ताकतों से इस (उपरोक्त) बात पर गंभीरता से विचार करने की अपील करते है और साथ ही गरम रोला मज़दूर आंदोलन में लगे मज़दूरों और उनके नेताओं से भी अपील करते हैं कि दूसरों (अन्य संगठनों) के पर्ति अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएँ और शालीन होना सीखें.यह उनके लिए और आंदोलन के लिए श्रेयस्कर ही नहीं ज़रूरी है, अन्यथा अंततः इसका खामियाज़ा उन्हें ही उठाना पड़ेगा..आंदोलन के साथ जो हो रहा है वह तो हो ही रहा है. हम उम्मीद करते हैं कि साथीगण हमारी सलाह और सदिच्छा को यथोचित कम्युनिस्ट भावना के साथ लेंगे...

Saturday, May 17, 2014

मोदी-आर.एस.एस.-भाजपा ब्रांड की जीत और आगे का रास्ता 


आरएसएस- भाजपा- मोदी ब्रांड फासीवादियों को मिली प्रचंड विजय का बहादुरी से सामना करें, जल्द ही फासीवादियों के झूठे वादों की कलई खुलेगी और देश जनांदालनों की राह पर होगा. आगामी संघर्षों व फासीवाद विरोधी राजनीतिक अभियानों की तैयारी में लगें

हमारी पार्टी फिर दुहराती है, अपना पूरा काला फन फैलाने के लिए बेकरार ज़हरीले फासीवाद को परास्त और पराजित करने के लिए सर्वहाराओं व मेहनतकश अवाम की एकजुट ताक़त को जगाने का, उनकी खंड-खंड विखंडित अगुआ ताकतों को क्रांतिकारी कार्यक्रम के आधार पर संगठित करने का और सीधे संघर्ष व लड़ाई के मैदान से तमाम वास्तविक फासीवाद विरोधी शक्तियों को आगामी महाअभियानों के लिए आह्वान करने का रास्ता ही एकमात्र रास्ता है. आज़ की परिस्थिति में इससे मुँह मोडने वाले या तो कुपमांडूक नौसिखुआ हैं या फिर जनता के गाढ़े वक्त में पूंछ दवाकर भागने की तैयारी करने वाले लाचार डरपोक भगोड़े ....

हाँ, एक बात और. मोदी और ममता की आँधी ने समुचे पार्लियामेंटरी लेफ्ट (सीपीआई-सीपीएम व अन्य) को सीटों की संख्या के तौर पर भले ही ध्वस्त कर दिया है, लेकिन हमारे प्यारे नादान संसदीय वाम का टिपिकल सोशल डेमॉक्रेटिक प्रोग्राम जस का तस सौ फीसदी बचा है और जारी है. उसे हमे और आपको मिलकर ही परास्त और पराजित करना होगा. दहाड़ मार मार कर छाती पीटने वाले संसदीय वाम के ईमानदार साथियों से पूछना चाहिए - क्या अब भी संसदीय वाम के अवसरवाद, सुविधवाद और संशोधनवाद सरीखे कीचड़ से नही निकलेंगें आप? मित्रों! हाथोंं में सोशल डेमॉक्रेटिक कार्यक्रम से लदे-फदे संसदीए वाम का लाल झंडा लिए साथियों से पूछना चाहिए - इसका अहसास हुआ है या अभी और बर्बादियों तथा कुर्बानियों का इंतज़ार व दरकार है ?